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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...2




प्रेम .....
गाहे-गाहे इसे पढ़ा कीजे  
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं 
.....
कोई रंग भरो,इसकी आभा की महिमा न जाए बखानी !उपमा,उपमान,उपमेय .... बशीर बद्र की इस रचना में प्रेम के आगे भावनाओं की शोखी है-
ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझ-सा कहूँ

गेसू उड़े महकी फ़िज़ा जादू करें आँखे तेरी
सोया हुआ मंज़र[1] कहूँ या जागता सपना कहूँ

चंदा की तू है चांदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या- क्या कहूँ क्या न कहूँ...
कहने के क्रम में प्रेम का प्रेम स्वरुप सबके अपने अपने हैं -
ऋता शेखर मधु’ - http://madhurgunjan.blogspot.in/
 
प्रेम एक है कई रूप हैं
कहीं छांव, यह कहीं धूप है
कहीं ये भक्ति कहीं है शक्ति
कहीं विरक्ति तो कहीं आसक्ति|
चमक रही थी चपल दामिनी
अनवरत बारिशों की झड़ी थी
पुत्र-प्रेम में वासुदेव ने
यमुना में ज्यों पांव धरे थे
यमुना क्यों उपलाई थी
पग कान्हा के छूकर उसने
अपनी प्यास बुझाई थी|
वात्सल्य-प्रेम में कान्हा के
यशोदा भी हरषाई थी|
कौन सा था प्रीत कान्हा
कौन सा वह राग था
शायद मधुर सी रागिनी से
बह रहा अनुराग था
बेबस बनी थी राधा प्यारी
लोक-लाज भूली थी सारी|
भक्ति में डूबी थी मीरा
महलों की वह रानी थी
मन के ही एहसास थे उनके
बन गई कृष्ण-दीवानी थीं|
निष्ठुर बने थे मोहन प्यारे
वृंदावन को छोड़ चले
विकल गोपियाँ सुध-बुध खोईं
किस प्रेम में वे थीं रोई|
पितृ-प्रेम में रामचन्द्र ने
वनवास भी स्वीकार किया
परिणीता सीता का पति-प्रेम था
दुर्गम वन अंगीकार किया
भ्रातृ-प्रेम से लक्ष्मण न चूके
उर्मि को विरह का भार दिया|
देख पति की आसक्ति
हाड़ा-रानी विचलित हुई
देश-प्रेम की खातिर उसने
अपने सिर का उपहार दिया
मनु ने झाँसी के प्रेम में
वीरांगना-भेष धार लिया|
पेड़ों से चिपक बहुगुणा ने
वृक्ष-प्रेम का दिया परिचय
जीवों से प्रेम करने का
मनेका का था निश्चय|
संयुक्ता को ले गए स्वयंवर से
प्रेम में कई समर हुए
मन-मंदिर में बसा इक दूजे को
लाला-मजनू अमर हुए|
अमृता की कविता इमरोज
इमरोज के चित्र में अमृता
इस प्रेम का क्या नाम होगा?
नाम से परे
यह एक एहसास है
दूर रहकर भी लगे
वह हमारे पास है
रूह से महसूस करो
चल रही जब तक सांस है
प्रेम की पराकाष्ठा
बन जाता उच्छवास है
प्रेम की बातें मधुरतम
सिर्फ वो ही जानते
जो प्रेम से बढ़कर जगत में
और कुछ ना मानते|
सीमा सिंघल'सदा'- http://sadalikhna.blogspot.in/
प्रेम सदा ही मधुर होता है,
चाहे लिया जाये या दिया जाये
जहां भी होता है यह
वहां विश्‍वास स्‍वयं उपजता है
किसी के कहने या करने
की जरूरत ही नहीं पड़ती
इसके लिए
प्रेम निस्‍वार्थ भाव
कब ले आता है मन में
कब समर्पण जाग जाता है
कब आस्‍था
आत्‍मा में जागृत हो उठती है
और एक ऊर्जा का संचार करती है
तरंगित धमनियां स्‍नेहमय हो
हर आडम्‍बर से परे
सिर्फ स्‍नेह की छाया तले
अपने जीवन को सौंप
अनेकोनेक सोपान पार कर जाती है
बिना थकान का अनुभव किये
मन हर्षित होता है
जीवन में सिर्फ उल्‍लास होता है
रंजो-गम से दूर
उसे सिर्फ एक ही अक्‍स नजर आता है
स्‍नेह का जिसे जितना बांटो
उतना ही बढ़ता है
अमर बेल की तरह .....
जब काम मरता है तब
प्रेम जागृत होता है
जब लोभ मरता है तो
वैराग्‍य का जन्‍म होता है
जब क्रोध का नष्‍ट होता है
तो क्षमा अस्तित्‍व में आती है
और क्षमा के साथ हम
फिर स्‍नेह को समर्पित हो जाते हैं ....!!!

रचना श्रीवास्तवhttp://rachana-merikavitayen.blogspot.in/
जब सूरज
कोहरे की चादर ओढ़ सोया हो
शहर पूरा
मध्यम रौशनी में नहाया हो 
थाम मेरा हाथ तुम
नर्म ओस पे
हौले सी चलना
जीवन जब थमने लगे
मायूसी दमन फैलाने लगे
तुम पास बैठ
प्यार में डूबे शब्द फैलाना
नर्म ठंडी बूँदें जो बर्फ़ बने 
रूई-सी सफ़ेदी 
जब हर शय को ढके 
उनमें बनते क़दमों के निशान 
संग मेरे तुम 
दूर तक जाना 
चाय की गर्म प्याली संग 
पुराना एलबम देखना 
पलटना एक एक पेज 
कुछ यों
के यादों के परदे पे
एक तरंग-सी उठ जाए 
उस तरंग में 
तुम मेरे साथ डूबना...
अंजू शर्मा -www.kavitakosh.org/anjusharma
चलो मीत,
चलें दिन और रात की सरहद के पार,
जहाँ तुम रात को दिन कहो 
तो मैं मुस्कुरा दूं,
जहाँ सूरज से तुम्हारी दोस्ती 
बरक़रार रहे 
और चाँद से मेरी नाराज़गी
बदल जाये ओस की बूंदों में,
चलो मीत,
चलें उम्र की उस सीमा के परे
जहाँ दिन, महीने, साल 
वाष्पित हो बदल जाएँ
उड़ते हुए साइबेरियन पंछियों में
और लौट जाएँ सदा के लिए
अपने देश,
चलो मीत,
चलें भावनाओं के उस परबत पर
जहाँ हर बढ़ते कदम पर
पीछे छूट जाये मेरा ऐतराज़ और 
संकोच,
और जब प्रेम शिखर नज़र आने लगे
तो मैं कसके पकड़ लूं तुम्हारा हाथ
मेरे डगमगाते कदम सध जाएँ 
तुम्हारे सहारे पर,
चलो मीत,
कि बंधन अब सुख की परिधि
में बदल चुका है
और उम्मीद की बाहें हर क्षण
बढ़ रही है तुम्हारी ओर,
आओ समेट लें हर सीप को
कि आज सालों बाद स्वाति नक्षत्र 
आने को है,
चलो मीत,
कि मिट जाये फर्क 
मिलन और जुदाई का,
इंतजार के पन्नों पर बिखरी
प्रेम की स्याही सूखने से पहले,
बदल दे उसे मुलाकात की
तस्वीरों में,
चलो मीत,
हर गुजरते पल में
हलके हो जाते हैं समय के पाँव,
और लम्बे हो जाते हैं उसके पंख,
चलो मीत आज बांध लें समय को 
सदा के लिए,
अभी, इसी पल..............
आरक्त चेहरा,खोयी आँखें,बढ़ती धड्कनें,रूकती-चलती साँसें और एक नाम- प्यार का ....
क्रमशः 

10 टिप्‍पणियां:

  1. एक नाम- प्यार का .... हो जब जिंदगी तो क्‍या सारी दुनिया अपनी लगती है
    बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ... आभार आपका

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  2. सीमा जी, रचना जी एवं अंजु जी की कविताएँ बेहद पसंद आई!!|
    अपनी कविता देख कर खुशी हुई...आभार !!

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  3. सभी कविताएं कमाल .. लाजवाब ...
    अच्छी चर्चा ...

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  4. सभी कविताएं बहुत बढ़िया हैं .....

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  5. arewah kamal hai itni sunder kavitaon me meri bhi kavita achchha laga dekh kar
    dhnyavad
    rachana

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  6. सारी कविताएँ बहुत बहुत अच्छी हें, सभी शामिल साथियों को बहुत बहुत आभार और उससे पहले आपको जो आप एक मंच पर लेकर हमें बिना मेहनत के पढ़ा रही हें.

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  7. एक जगह ...प्यार ही प्यार.अच्छा लग रहा है,यहाँ आकर.

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