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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

तपस्वियों सी हैं अटल अभिव्यक्तियाँ


तुम लाख कहो अलविदा
भावनाएं तो पुरवा का झोंका है
कभी मुस्कुराती
कभी खिलखिलाती
कभी गुनगुनाती
कभी सिसकती
कभी मौन सी छू ही जाती है....
.....पर अरुणा कपूर ने की है विदा की बातें, यादों की गठरी में लिए अनगिनत यादें, कहती हैं अलविदा ! http://jayaka-rosegarden.blogspot.in/2012/05/blog-post_10.html
भला ऐसे कोई जाने देगा ?
अभी तो बहुत कुछ कहना है
तुम्हें भी,हमें भी - जाना तो है ही, अभी नहीं -
कलम की उदासी का ख्याल करो
कितने नए घोंसले बने हैं
उन चीड़ों का ख्याल करो ....

विद्यालय से निकल भले ही तुम नौकरी करो, कुछ भी बन जाओ...पर ज़िन्दगी की पाठशाला से मुक्ति नहीं मिलती, नहीं मिलती मुक्ति सवालों से -
छल,छद्म,सत्य,झूठ...सबके सवाल होते हैं
तुम चाहो न चाहो अभिमन्यु बनकर रहना पड़ता है
हर बार मरकर जीना पड़ता है
अनुत्तरित सवालों के हल जब तक ना मिलें
मुक्ति कहाँ संभव है !.... निवेदिता और उनकी उलझनें http://nivedita-myspace.blogspot.in/2012/09/blog-post_12.html

ख्वाब है तो हकीकत है
ख्वाब है तो उसे टूटना भी है
ख्वाब है तो उम्मीदें हैं
ख्वाब है तो रुदन है ...
मीता पन्त कहती हैं - ख्वाब देखो तो ना भूलो http://meetapant-dreams.blogspot.in/2012/09/blog-post_11.html
मत भूलो कि कुछ भी हो सकता है !

बीजारोपण ही कर्त्तव्य की इति नहीं... बीज शिशु हो,प्रेम हो,दायित्व हो,रक्षा का हो,किसी भी आरम्भ का हो...उसके प्रति सजगता,उसकी समुचित देखभाल,समय पर सिंचन,काट-छांट, उर्वरक खाद क्षमता ज़रूरी है. सुराही खरीद लेने मात्र से प्यास बुझ जाए तो क्या बात है !
डॉ गायत्री गुप्ता 'गुंजन' की रचना http://drgayatrigunjan.blogspot.in/2012/09/blog-post_12.html ऐसे ही एहसासों का ज़िक्र करती है

दिया नहीं
खाद समय का...
सींचा नहीं
स्नेह के जल से...
समाधान नहीं खोजा
जगह-२ उग आये
प्रश्न रुपी
खरपतवार का...
फिर
कैसे तुम्हें
इत्मीनान है कि
उगेंगे
भरोसे के एहसासात
सुकून की डाली पर.....!!....


आज की स्थिति,हर तरफ गुहार है,फिर भी समय .... क्या समय उदासीन है?या तख़्त पर बैठा तथाकथित मसीहा? कोशिशें जारी हैं कहने की,कभी कविता,कभी आलेख, कभी ग़ज़ल,कभी फिल्म, कभी नाटक... यही कोशिश है दिगम्बर नासवा की इस ग़ज़ल में

काल के परिवर्तन के साथ सच अपना स्वरुप खोता गया,संबंध अपने मायने खोते गए . आध्यात्म को अनावृत कर सबने अपने अनुसार
बना लिया-प्यार,व्यभिचार सब एक ही सांचे में ..... कहाँ संभव है ! प्रेम तो बस प्रेम होता है,अश्लीलता से पृथक ... कृष्ण को आज भी नहीं कहना होगा कि मैं कृष्ण हूँ ...
सत्य तो जंगल में भटक भी जाए तो अपना वजूद नहीं खोता - आज के परिवेश में सांसारिक रंगमंच पर नाटक खेल लेने से कोई पात्र ईश्वर नहीं हो जाता .
पूनम सिन्हा का यही रोष इस आलेख में है, जो सत्य और असत्य का फर्क बताती है http://punamsinhajgd.blogspot.in/2012/08/blog-post_30.html
राधा और कृष्ण....प्रेम की भावना....एक चेतना स्वरुप...एक दूसरे में समाहित...! प्रेम की वह धारा जो बाहर बहते-बहते अंतर्मुखी हो जाए...जिससे इंसान पूर्णत: प्रेम स्वरुप हो जाए...वह राधा....जो हर इंसान के अंदर है...थोड़ा कम...थोड़ा ज्यादा....लेकिन है सबमें...!!
बस एक इंसान ही है जो इसका भी वर्गीकरण कर लेता है....!

जीवन प्रतिपल सरकता है, हर उम्र में कुछ हाथ से छूट जाता है,खो जाता है - और खोने की बेचैनी,दर्द अपना अपना होता है.उम्र की बात है- वह चौकलेट हो,या गुड़िया,या कलम,या .......रिश्ते !
संजय भास्कर ने इसी मर्म और ख़ुशी को अभिव्यक्त किया है - http://sanjaybhaskar.blogspot.in/2012/08/blog-post_30.html
खोयी चीज का मिलना और कभी ना मिलना - अलग अलग अनुभव देते हैं .

इन तमाम अभिव्यक्तियों में एक तप है,बिना तप,ध्यान-गहरे विचार नहीं बनते ..... विचारों की अन्य बानगियों के साथ मिलती हूँ फिर- तब तक इन अटल अभिव्यक्तियों से गुजरें ....

8 टिप्‍पणियां:

  1. तपस्वियों सी हैं अटल अभिव्यक्तियाँ
    बिल्‍कुल सच कहा आपने ... बिना तप,ध्यान-गहरे विचार नहीं बनते ..... ना ही हर कोई साधक

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  2. वाह ... इस बुलेटिन का तो पता ही नहीं था ... अभी बुक मार्क करता हूँ ...
    शुक्रिया इस परिचय का ...

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  3. तपस्वियों सी हैं अटल अभिव्यक्तियाँ..अरे !इस बुलेटिन का तो पता ही नहीं था ...बहुत सुन्दर ..

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  4. धन्यवाद रश्मि दी, मेरी रचना को इतने सुन्दर एहसास देने का...

    शेष रचनाएं भी गहरे भावों से ओत-प्रोत हैं...
    आभार...!

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  5. शुक्रिया....
    इस बुलेटिन में इतने बड़े बड़े सुधीजनों के बीच मुझे जगह देने के लिए...! इस तरह से किसी भी बुलेटिन पत्रिका में सम्मिलित होने से नए और पुराने कई मित्रों से बराबर संपर्क बना रहता है...और सदैव ज्ञानवर्धन भी होता रहता है...!! मेरा सौभाग्य जो मुझे यहाँ स्थान मिला......!!

    जैसा कि पढ़ा,सुना,संपर्क में आने वाले लोगों को देखा,समझा,जाना और जीवन की परिस्थितियों ने दिखाया,बताया और समझाया या हमने समझा....जैसा कि हम सभी समय समय पर महसूस करते हैं या करते रहते हैं.....शायद हम तभी लिख भी पाते हैं..! हो सकता है किसी की लेखनी रोष में चलती हो.....लेकिन मेरी लेखनी इस विषय में आश्चर्य स्वरूप चल गयी है....मेरे इस आलेख की उत्पत्ति रोष के फलस्वरूप कदापि नहीं है...! पूरे आलेख में कहीं भी प्रेम को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में भी व्यभिचार और अश्लीलता का जामा नहीं पहनाया गया है...!! बस कुछ परिस्थितियों और व्यक्तियों की व्यक्तिगत सोच से इस आलेख की रचना हो गयी...हो सकता है आप भी कभी कभी लिखते वक़्त ऐसा ही करते हों...!!
    द्विविधा तब उत्पन्न हो जाती है जब आज के परिवेश में संसार रूपी रंगमंच पर अपने जीवन को नाटक की खेलने वाले पात्र अपनी ही किसी भूमिका में उलझ जाते हैं तो उनके लिए नाटक के दूसरे पात्रों की भूमिका नगण्य हो जाती है...इसी के साथ उनकी अपनी भावनाएं,अपनी सोच,अपना ज्ञान,समाज-परिवार और जीवन में अपना स्थान ही अतिउत्तम और सर्वोपरि लगता है..!
    कुछ ऐसे ही विचारों से इस लेख का भी जन्म हुआ है या हो गया है...! अपने आस पास देखती हूँ तो ऐसे ही कुछ लोगों को पाती हूँ जो जीवन में अपनी भूमिका के लिए छटपटा रहे हैं....किन्तु जीवन में दूसरों की भूमिका,भावनाएं,संवेदनाएं मायने नहीं रखतीं हैं...! जीवन में यदि स्वयं के लिए इस तरह की भूमिका तय करते हैं तो उन्हीं के जीवन में उनके साथ रहने वालों की भी भूमिका इसी तरह की हो तो उनका रवैय्या कैसा होगा...??? अपने लिए जीवन में दोहरी भूमिका,दोहरा चरित्र निभाने वाले लोग अपनी ही सच्चाई को बड़ी आसानी से समाज से छुपा ले जाते हैं और फिर इन उदाहरणों से स्वयं को ही logicaly समझाने में लगे रहते हैं...!!
    बस यह आलेख इसी भावना से लिखा गया है....कि हम जिन पात्रों के जीवन या जीवनी से स्वयं के जीवन या जीवनी को मिलाते हैं...उनके जैसी सच्चाई भी हम अपने जीवन में उतारें...! यहाँ न किसी सम्बन्ध की अश्लीलता है का उल्लेख है और न किसी प्रकार का रोष का प्रदर्शन.....!
    हो सकता है कि पढ़ने वाले इस लेख को रोष के साथ पढ़ें और उन्हें इस लेख में रोष ही नज़र आये.....!!

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  6. अटल अभिव्यक्ति
    मेरी रचना को यहाँ स्थान देने के लिए,आपका बहुत-बहुत धन्यवाद रशिम माँ

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  7. सभी लिंक्स अच्छे हैं....आज पहली बार आपके इस ब्लॉग पर आना हुआ......@ पूनम जी की बात से सहमत हूँ.....सब नज़रिए की बात है। हम जो पढ़ते हैं या सुनते हैं वो काफी हद तक हमारे ही मन की भावनाओ को उन शब्दों पर प्रत्यारोपित करता है।

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